Description
आदिकवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकीय रामायण को ‘आदिकाव्य’ कहा जाता है। आदिकवि ने बिना किसी अन्य ग्रन्थ की सहायता से इस धरातल के सर्वश्रेष्ठ काव्य की रचना की। श्रीअप्ययदीक्षितेन्द्र ने तो रामायणतात्पर्ययनिर्णय नामक अपनी व्याख्या में ‘श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण’ को शिवपरक माना है।
कुछ लोगों ने सुन्दरकाण्ड के श्लोकों को रसादि से युक्त माना है तथा श्लोकों के अलंकार से सुन्दरकाण्ड के नाम को सार्थक दर्शाया है। सुन्दर काण्ड का ५वाँ सर्ग बहुत ही सुन्दर है। चाहे श्रीराम की प्रतिपादन शैली हो, अयोध्याकाण्ड के २रे सर्ग में राजा दशरथ की सम्भाषण शैली, युद्धकाण्ड के १६वें सर्ग में कहीं कहीं रावण का कथन, सब बहुत ही सुन्दर घटनाएँ हैं। युद्ध काण्ड के १०वें सर्ग में विभीषण ने लंका के अपशगुनों को बताया है, त्रिजटा का सपना, श्रीराम की यात्राकाल का मुहूर्त आदि घटनाएँ ज्योतिर्विज्ञान को प्रतिपादित करती हैं। श्रीराम जब अयोध्या से प्रस्थान करते हैं, तो नवग्रहों के एकत्र हो जाने से लंका में युद्ध होता है।
अयोध्याकाण्ड के ४थे सर्ग के १८वें श्लोक में राजा दशरथ ने श्रीराम को ज्योतिषियों की कही हुई अनिष्ट फल की बात कही है। युद्ध काण्ड के ९२वें सर्ग में आयुर्वेदचिकित्सा का उल्लेख है। युद्धकाण्ड के १०२वें सर्ग के ३२-३४ श्लोक में रावण के वध की कालस्थिति का वर्णन प्राप्त होता है। युद्ध काण्ड में १८ और ६३वें सर्ग के २ से २५ श्लोक में राजनीति का सारगर्भित उल्लेख है। युद्ध काण्ड में ७३वें सर्ग के २४-२८ श्लोक में रावण तथा मेघनाद की तन्त्रशास्त्र में निपुणता दर्शायी गयी है। युद्ध काण्ड के १००वें सर्ग के १४वें श्लोक में रावण की पताका पर मनुष्य की खोपड़ी का चिह्न था जो उसकी तन्त्र शास्त्र में कुशलता तथा दक्षता को इंगित करता है।
रामायण में श्रीराम की ईश्वरता को दर्शानेवाले सर्ग तथा श्लोक; बालकाण्ड १५-१८ सर्ग, ७६ सर्ग के १७-१९ श्लोक। अयोध्याकाण्ड के १सर्ग का ७वाँ श्लोक। अरण्यकाण्ड के ३रे सर्ग का ३७ श्लोक। सुन्दरकाण्ड के २५वें सर्ग के २७, ३१वाँ श्लोक, ५१ का ३८वाँ श्लोक। युद्ध काण्ड में ५१ सर्ग का ११०, ९५ सर्ग का २५, १११ तथा ११७वाँ सर्ग, ११९का १८ तथा ११९ के ३२वें श्लोक में स्पष्ट रूप से ‘ब्रह्म’ शब्द का वर्णन है। उत्तर काण्ड के ८वें सर्ग के२६, तथा ५१सर्ग के १२-२२ तक के श्लोक; १०४ सर्ग का ४थे श्लोक में श्रीराम को ईश्वर के रूप में प्रतिपादित किया गया है।
इन श्लोकों का गहराई से मनन एवं चिन्तन करने पर यह दृष्टिगोचर होता है कि प्रत्येक श्लोक श्रीराम की धर्म-प्रियता, अचिन्त्य शक्ति, शरणागत-वत्सलता तथा ईश्वरता का प्रतिपादक है।
आदिकवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा विरचित वाल्मीकीय रामायण में ज्योतिष, तन्त्र, आयुर्वेद तथा राजनीति का सारभूत उल्लेख मिलता है। रामायण में उच्च कोटी की राजनीति का निर्वहन दृष्टिगत होता है। हनुमानजी नीतिमत्ता के ज्वलन्त उदाहरण है। विभीषण के आने पर श्रीराम जब सबकी सम्मति के लिए पूछते है तो हनुमानजी ने सुग्रीव, जाम्बवन्त, अंगद, शरभ आदि के द्वारा प्रस्तुत किये गये विचारों का अभूतपूर्व रूप से खण्डन किया। हम देखते हैं कि लंका में प्रवेश करने के बाद का विचार विमर्श, माता सीता से वार्तालाप करने से पहले, किस भाषा में बात करूँ आदि, पुनः माता सीता से वार्तालाप के बाद दूत के रूप में अपने कर्तव्य के लिए किये गये प्रयास, सुग्रीव को भोग में मग्न देखकर परामर्श देना, लंका की शक्तिशालिता की जानकारी और रावण को दिया गया उपदेश, इससे हनुमानजी की नीतिमत्ता, श्रीरामजी के प्रति अद्भुत भक्ति, प्रकाण्ड बुद्धिमत्ता, साधुता, सद्गुणता की अभिव्यक्ति होती है, इसलिए हनुमानजी को ‘बुद्धिमतां वरिष्ठम्’ कहा गया है। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में व्यवहार, अर्थशास्त्र, तथा नैतिक आचरण का वर्णन प्राप्त होता है जो एक कुशल तथा समीचीन मार्गदर्शन प्रदान करता है।
Author : Shrimad Valmiki; Translator : Pt. Chandrashekhar Shastri
















